आज हम एक ऐसी महिला की हकीकत बताएँगे जिसने ११ साल से कुछ नहीं खाया है उसकी मुंह की स्वाद गरंथियाँ काम करना बंद कर दिया है, अब वो कुछ भी खायेंगी उसे कुछ भी स्वाद नहीं आएगा. ये महिला मणिपुर में सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (एएफएसपीए), 1958 के खिलाफ भूख हड़ताल पर
बैठी और आपनी लड़ाई शुरू की जो आज भी जरी है और ये जिन्दा भी हैं, मगर देखिये ये जिन्दा कैसे है, सरकार इसे जबरदस्ती जिन्दा रखा है, सिर्फ जिन्दा रखा है इसकी बात नहीं मणि गयी है इन्हें दिखाना चाहता है की तुम देखो की कोई आम आदमी या महिला सरकार के खिलाफ आवाज उठाये तो क्या हश्र होता है.
बैठी और आपनी लड़ाई शुरू की जो आज भी जरी है और ये जिन्दा भी हैं, मगर देखिये ये जिन्दा कैसे है, सरकार इसे जबरदस्ती जिन्दा रखा है, सिर्फ जिन्दा रखा है इसकी बात नहीं मणि गयी है इन्हें दिखाना चाहता है की तुम देखो की कोई आम आदमी या महिला सरकार के खिलाफ आवाज उठाये तो क्या हश्र होता है.
पहले हम ये बताते हैं की संविधान (1958) क्या है ?
अरुणाचल प्रदेश,जम्मू और कश्मीर, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड और त्रिपुरा में ये संविधान लागु था, परन्तु आज़ादी के बाद कुछ राज्यों से इसे हटा लिया गया पर जम्मू और कश्मीर, मणिपुर और नागालैंड पर लागु था (मेरे जानकारी के मुताबिक) इसके कुछ समय बाद जम्मू और कश्मीर और नागालैंड से ये हटा लिया गया. सिर्फ मणिपुर में ही ये अबतक लागु है. वहां की सशस्त्र बल को इतने अधिकार प्राप्त है की वो लोग इसका दुरुपियोग हद से ज्यादा कर रहा है. वहां की सशस्त्र बल इतने क्रूर हैं, की उन्हें अगर किसी आदमी पर शक हो जाये की वो कोई आतंक फैला सकता है तो वो उसे गोली भी मार सकता है, वे लोग बिना वारेंट के ही घर की तलाशी ले सकता है और कोई घर में सुन्दर लड़की को देख ले तो बलात्कार भी कर सकते हैं और ज्यादा करते ही हैं.
जैसे की आप ये मनोरमा देवी का केश ले लीजिये सशस्त्र बलों को शंका था की मनोरमा देवी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के एक संदिग्ध सदस्य हैं. उन्हें उनके घर जाकर रात में गिरफ्तार कर ले गए और उनका सामूहिक बलात्कार कर के छोड़ा नहीं उनके गुप्तांग में और सीने पर गोली मार कर उनके घर से कुछ दूर पर फैंक दिया. जब इस बात पर हंगामा हुआ तो उन बलात्कारियों का जवाब था की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के एक मीटिंग चल रही थी और हम जब पहुंचे तो भागने के क्रम में उन्हें गोली मारनी पड़ी. तो ऐसी कई एक घटनाएँ होती रहती है वहां ये सब देख के वह महिला बेचैन हो उठी और इस अधिनियम को हटाने की मांग करने लगी और 4 नवम्बर २००० से भूख हड़ताल पर बैठी.
इस क्रन्तिकारी महिला का नाम है इरोम शर्मीला चानू जो कोंग्पल, (मणिपुर, भारत) की रहनेवाली है। इनकी लड़ाई में इनका पूरा परिवार इनके साथ है। इनके भाई ने इसके लिए आपनी नौकरी छोड़ दी। शर्मीला एक गरीब घर की लड़की है, इसके पिताजी एक छोटी नौकरी करते थे जिससे इनका घर चलता है।
और एक हमारी सरकारें जो अंधी भी है और बहरी भी है। शायद ये एक पत्थर की मूर्ति है जिसमे जान नाम की कोई चीज नहीं होती है, जितना सर पटकोगे उतना ही खून बहेगा।
शर्मीला ने अगर कोई हवाई जहाज हाइजैक कर लिया होता तो उसकी बात जरुर मान लिया जाता। आज कल सभी लोग प्रायः आन्दोलन करते हैं आपने मतलब के लिए। लेकिन शर्मीला आज भी जूझ रही है सब के लिए। जब तक अन्ना जैसे लोग आन्दोलन नहीं करेंगे तब तक उनकी मांगे पूरी नहीं हो सकती। ये देश भारत अब आम आदमियों के लिए नहीं रहा। यहाँ आम जनताओं का कोई सुनने वाला नहीं है। अरे हम आम जनताओं से ही संसद बनता है और हमारी ही बात को ठुकरा दिया जाता है।
जब तक हमारे देश में चोर और बेशर्म जैसे नेता रहेंगे। यहाँ हर रोज एक शर्मीला की हालत ऐसी होती रहेगी। और मनोरमा देवी जैसी हालत अनेको महिलाओं की होते रहेगी।
हमें आपना पूरा साथ इरोम शर्मीला दें। और इनके बारे सभी से चर्चा कीजिये।
इरोम शर्मीला की लड़ाई और उनकी बुलंद आवाज को मेरा सलाम है।

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