Thursday, 26 January 2012

हकीकत

लोग कहते हैं की भारत गरीब देश है परन्तु हकीकत तो ये है की भारत गरीब नहीं गरीबों का देश है। यहं पूछिए की कितने पूंजीपति रहते हैं तो तुरंत पता चल जायेगा यही अगर पूछिए की कितने लोग गरीब हैं तो कुछ भी आंकड़े सही नहीं आते हैं।
अब देखिये हमारे स्कूलों में पढाया जाता है और हम सभी जानते हैं की भारत एक कृषि प्रधान देश है, लेकिन आज भी हमारे देश में खाने के लिए अन्न नहीं मिलता है इसके लिए हमें दुसरे लुटेरों वाले देश पर निर्भर रहना पड़ता है आखिर क्यूँ ?
आज जो इतनी महंगाई बढ़ गई है लोग कैसे जियेंगे जिनके पास पैसा है वो जियेगा ही और जिनके पास ना काम है और ना ही पैसा वो कैसे जियेंगे ? क्या होगा उनका ? क्या होगा उनके परिवार का, उनके बच्चों का ? कोई बता सकता है !
क्या होगा कुछ नहीं भूखे मर जाएंगे या फिर सामूहिक आत्मदाह करलेंगे। सरकार को इससे कोई दिक्कत नहीं है क्यूँ की उनका थोड़े ही ना कोई मरता है।
अब देखिये सरकार जो योजना गरीबों के लिए बनती है वो गरीबों तक पहुँचने से पहले ही समाप्त हो जाती है या फिर नाम मात्र का मिलता है जिससे उसे मिलना या ना मिलना दोनों ही बराबर है।
आज के नेताओं ने तो भ्रटाचार का ठीक ले ही लिया हो जैसे।
देश की जनताओं के पैसे के बल पर नाचने वाले नेताओं को जल्द ही सतर्क हो जाना चहिये, क्यूंकि जिस दिन जनता जग गई तो फिर इनका बचना और जीना मुस्किल हो जायेगा।
इन सब चीजों के लिए जिम्मेदार हम लोग भी हैं, क्यूंकि हम कुछ सोच  विचार कर वोट नहीं देते बहकावे में आकर देते हैं, हम जागरूक नहीं हैं ये सब अशिक्षा के कारन होता है। भारत में अब भी कई गांव ऐसे हैं जहाँ के लोग दसवीं तक पढाई नहीं कर पते हैं क्यूंकि उनके परिवार की स्थिति इतनी ख़राब होती है की वो वहीँ से पढाई छोड़ कर काम में लग जाता है और आपना परिवार चलाने लगता है। अब बताइए भला ये कैसे जान पाएंगे की कौन सा नेता का चरित्र कैसा है। और इनका जो मुखिया होता है उनको उल्टा-पुल्टा पढ़ा कर या या कुछ पैसे थमा कर खरीद लेते हैं । और जीत जाते है और ये इतने बेशर्म होते हैं की जिनके वोट से जीतते हैं उन्ही को फिर दोबारा कभी देखने नहीं जाता है। ऐसे नेता फिर जब अगली बार वोट मांगने केलिय आये तो उनके लिए एक गधा और पुराने और गंदे जूते-चप्पल की माला से स्वागत करनी चाहिए।
हम उन्हें किस लिए जीता कर भेजते हैं की वो आम जनताओं की बात और तकलीफों को उपर तक पहुंचाए और वो साडी सेवाएँ मुहैया करवाए जो हम गरीबों के लिए आती है। हम गरीबों के लिए सबसे जरुरी जो होता है वो है, अस्पताल, पहली से बारवीं तक की निः शुल्क शिक्षा, सस्ता अनाज, बेरोजगारों को रोजगार आदि सबसे जरुरी है।
जहाँ अस्पताल होना चहिये वहां होता नहीं है या होता है तो इतना बुरेहाल में होता है की मरीज और कुत्ते को साथ में सोना पड़ता है। ऐसा लगता है की ये सरकार का नियम हो की जहाँ जो चीज़ होनी चाहिए वहां नहीं होती है और जहाँ नहीं होनी चाहिए वहां होती है।
अब देखिये दिल्ली में राष्ट्रीय खेल की तैयारियां जोर-शोर से चल रही थी अब सड़क के किनारे रहने वाले उन झुग्गी झोपडी वालों का क्या कसूर था जो उन्हें वहां से भगा दिया गया चलिए उन्हें हटवा दिए तो कम से कम उनके लिए रहने का कहीं और जगह दे देते। लेकिन वो तो करेंगे नहीं क्यूंकि वे लोग इस देश के थोड़े ही हैं इस देश का वास्तविक नागरिक तो यहाँ के पुन्जिपतियाँ है जिनका पिछलग्गू बनके ये सरकार घुमती है।
1 अप्रैल 2010 से सरकार ने शिक्षा का अधिकार विधेयक पास किया है, जिसमे 6 से 14 साल तक के बच्चे को मुफ्त शिक्षा मिलेगी यानि कुल मिलाकर दसवीं तक मुफ्त मिलेगी तो इसमें नया क्या है ये नियम तो पहले भी लागु था, सरकार ने ठान ही लिया है की हम भोली-भाली जनताओं को मुर्ख बनाना है। 
ऐसे ही बनता है हर बच्चा देश का नागरिक। 
आज-कल सरकार जो भी योजनायें निकल रही है उसमे कहीं ना कहीं उसका फायदा और बिचोलियों का भी फायदा छुपा रहता है। हम गरीबों का क्या होगा, कुछ नहीं होगा हम इसी तरह से जियेंगे और मर जायेंगे।। उनको हम गरीबों से कोई मतलब नहीं होता है अगर होता तो आज हमारा भारत सर्व संपन्न देश होता।

1 comment:

  1. माफ कीजियेगा इसमें कुछ गलतियाँ है, फिर भी समझ जायेगा धन्यवाद्|

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